April 26, 2017

A preliminary sketch concerning a language

A poem by Afzal Ahmed Syed - the original in a Devanagari transliteration, folowed by my English translation.
एक ज़बान से मुताल्लिक़ इब्तिदाई ख़ाका

तुम्हारी ज़बान हर सतर में मुख़ालिफ़ सिम्त से शुरू होती है. लफ़्ज़ों का तलफ्फुज़ दिन से रात में मुख्तलिफ हो जाता है और उनके इमला मौसमों के साथ तब्दील हो जाते हैं. किसी ख़ास दिन कोई नया हर्फ़ दाख़िल होता है और किसी दिन कोई मानूस हर्फ़ खारिज हो जाता है. अब्जद की शक़्ल तुम्हारे लिबास के साथ बदल जाती है. तुम उन लफ़्ज़ों को जोड़ने की कोशिश नहीं करतीं जो तुम्हारी बेएहतियाती से तुम्हारे क़दमों के नीचे आकर टूट गए क्योंकि तुम्हारी ज़बान दुनिया की सबसे ज़यादा पुरमाया है. तुम्हारे पास पहले, दुसरे और किसी भी बोसे के लिए अलग-अलग लफ्ज़ मौजूद हैं. अगर तुम किसी बात पर रो पड़ो तो दुनिया भर में तुम्हारी ज़बान में लिखी हुई किताबें भीग जातीं हैं.

A preliminary sketch concerning a language

In your language, every line begins in an opposite direction. The words vary in pronunciation from day to night and their spellings change with the seasons. On special days, a new word is admitted, and on others, some familiar word becomes obsolete. The alphabet changes shape when you change your clothes. You do not try to put together the letters that are crushed carelessly by your feet, because your language is the richest in the world. You have separate words for the first kiss, the second kiss, and all other kisses. If you burst into tears for some reason, every book in the world written in your language gets drenched.

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